बुधवार, १५ डिसेंबर, २०१०

महाकवी कालिदास रचित " रघु वंश " सर्ग ४ - ऋचा 41-60

रघुवंश सर्ग - ४

वृत्त:-- अनुष्टुभ




सहोनी शर वर्षावा अरींच्या जय पावला /

अभिषिक्त असा राजा राजलक्ष्मीस मानला // ४१ //

नागवल्लीचिया पत्रे पानशाला उभारुनी /
नारिकेला सवां पीती शत्रुं कीर्तीच मानुनी // ४२ //

विजयी रघु तो सोडी महेंद्रा जिंकिल्यावरी /
लक्ष्मी त्याची हरी किंतु मेदिनी नच ती हरी // ४३ //

अनन्य विजयी राजा दिशा पूर्वेस जिकुनी /
पूगी फल वनें चाले दिशा दक्षिण लक्षुनी // ४४ //

भटे कहूळिलें तोया मदाचा गंध लागला /
ऐशी देखोनि कावेरी सिंधू अंतरी शंकला // ४५ //

वीजयेछु पंथे थांबे तत्सेना मालयाकडे /
कंकोळ सेवनें जेथें राघू फिरती चहूंकडे // ४६ //

आश्वांच्या पाद घातांनी एला धूली उडे वरी /
सम गंध अशा थांबे गजकुंभ स्थालावारी // ४७ //

भुजंगे वेष्टिल्या स्थांनी चंदनाच्या तरुवरी /
दृढ तें ग्रैव दंतींचे शृंखला तोडिती जरी // ४८ //

दक्षिणेच्या दिशें जातां मंदावे रवी तेज ही /
तेज ना सोसवे पांड्या रघूचे त्यां दिशेसही // ४९ //

मुक्त राशी सागराच्या ताम्र पर्णी नदी तिरी /
विनम्र होवूनी देती स्वसंचित यशापरी // ५० //

यथेच्छ् सेवुनी त्यांतें शोभे चंदन ज्यांवर /
तिच्या कुचा परी दोन्ही गिरी मलय दर्दूर //५१ //

पराक्रमी राघू जाई साह्यातें लंघुनी पुढे /
शोभे श्रोणीपरी क्ष्मेच्या वस्त्र सागर जै उडे // ५२ //

वाटे कोंकण जिंकाया सैन्यजो चालले पुढे /
सारिला जमद्ग्न्यानें सिंधू सह्यास तो भिडे // ५३ //

भयानें रघूच्या भूषा त्यागिती केर लांगना /
सेना धूली कंचा झांकी झाली सौंदर्य साधना // ५४ //

केतकीच्या परागांते मुरला वात आणुनी /
सुगंधवी विनायासें भटांचे पट शिंपुनी // ५५ //

अश्वांच्या गमन वेगानें भटांचे कवच नादती /
त्या घोषे वायू वेगींचे ताल घोषहि लाजती // ५६ //

खर्जूर वृक्ष राजीनां सेनेचे गज बांधिती /
त्यांच्या मद सुगंधाने अली पुन्नाग त्यागिती // ५७ //

सागरें भार्गवा लागीं प्रार्थितां भूमि अर्पिली /
पाश्र्चात्य भू रूपानें रघूतें खंडणी दिली // ५८ //

मदोन्मत करी त्याचे त्रिकुटी दंत मारिती /
अद्री तोंचि जयस्तंभ चिन्हे विक्रम लेख ती // ५९ //

भू मार्गे पुढे जाई पारसीकांस जिंकण्या /
तत्वज्ञान पंथे जैसा योगी इंद्रिय जिंकण्या // ६० //

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